शिवप्रसाद सिंह ‘ रुद्र ‘ की इस किताब के बारे में यही कहूंगा कि हिंदी साहित्य का ये दुर्भाग्य है कि ऐसी रचना को कोई विशेष स्थान नहीं मिला । यह कोई प्रसिद्धि नहीं प्राप्त कर सका जबकि पात्रता में यह किसी भी बहुचर्चित उपन्यास से कम नहीं ।
ये रचना उपन्यास है या कहानी संग्रह ? इस बात पर आज भी आलोचकों को संदेह है। हालांकि इसका उत्तर लेखक स्वयं ही एक प्रश्न से देता है , वो पूछता है कि ” क्या कथा साहित्य की विधाएं कहानी और उपन्यास तक ही सीमित है ? ” विधाएं साहित्य की जननी नहीं है , साहित्य ही विधाओं का जनक है ।

ये कृति एक अनूठा प्रयोग है । इसमें 17 अध्याय हैं । प्रत्येक अध्याय अपने आप में एक कहानी है और सब मिलाकर एक उपन्यास भी । कथाएं बनारस के इर्द-गिर्द घूमतीं हैं । लगभग 200-300 वर्ष के अवधि में इसके कथावस्तु का विस्तार है । अन्य उपन्यासों की तरह इसका कोई मुख्य पात्र नहीं है या यूं कहें कि इसका मुख्य पात्र किसी व्यक्ति के बदले कोई स्थान विशेष है । ये कहानी है गंगा के घाटों की , उनसे अठखेलियां करतीं लहरों की , बनारस के गली – मुहल्ले – चौक – चौराहे की । ये कहानी है बनारस के बरामदे में सरकते समय की । किस्सा है कोई , गल्प है साहेब । कुछेक तो दंतकथा ही समझिए ।
क्या नहीं है आख़िर! प्रेमी का विरह , प्रेमिका की वेदना ; पति – पत्नी का व्यंग्य , सौत का कटाक्ष ; शौर्य का बखान और ज़ुल्म की दास्तान । लेखक की भाषा पर पकड़ केवल प्राक्कथन पढ़कर ही समझ सकते हैं । कुछेक शब्दों को छोड़ दें तो बेहद आम शब्दों का प्रयोग किया गया है और जिस समझदारी से स्थानीय बोली का प्रयोग संवाद के दौरान किया गया है वह भी प्रशंसनीय है । कहावतों और मुहावरों का प्रयोग आकर्षित करता है जैसे ये उदाहरण देखिए — ‘ बड़ी सहुआइन के मुंह फुलाने की आशंका से उनके हाथ पैर फूल गए ।
कम शब्दों में चरित्र चित्रण कितने अच्छे से किया जा सकता है इसका भी उदाहरण यहां मिल जाएगा । जैसे एक कहानी में अमीरन पात्र का चित्रण देखिए — …. वहां एकत्र लोगों में निमूंछिए कहते , ” बेहया है ” , अधेड़ कहते , ” बेलौस है ” , बूढ़े कहते , ” जोगिन है ” और स्वयं अमीरन पूछने पर कहती ” मैं क्या थी ये भूले जमाना हो गया है । “
मेरे मन में ये प्रश्न हमेशा ही उठता रहा है कि क्यों हिंदी साहित्य में केवल विलाप और व्यथा को ही स्थान मिला ? हिंदी कथा साहित्य को तो जैसे पीड़ा के अलावा कुछ दिखता ही नहीं । आलोचक भी हर किताब के बारे में यही कहते मिलेंगे कि — ” इसमें फलाने समस्या का उल्लेख मिलता है । ” क्यों भई ! क्या समस्या से इतर कोई विषय नहीं ? आप उल्लास क्यों नहीं लिख सकते? व्यंग्य से क्या दुश्मनी भंते ? हे सुज्ञ ! फंतासी ने क्या अपराध किया है ?
कुछ नहीं ! …. आप बस समस्याओं पर विमर्श करेंगे । वास्तव में भारत और भारत का साहित्य दोनों ही विचार – विमर्श के तले ऐसा दबा है कि उसकी पीठ ही टेढ़ी हो गई है । इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने इस लीक को तोड़ा है । पीड़ा पुराण के इस रूढ़ि को ख़तम किया है । ऐसा भी नहीं है कि वास्तविकता से मुंह मोड़ लिया । वेदना , यंत्रणा , व्यंग्य , कटाक्ष , उल्लास आदि भाव उचित मात्रा में इन कथाओं में मिल जाएंगे ।
बस एक दिक्कत जो आपको हो सकती है वह ये कि कहानी कहीं कहीं कंफ्यूज करती है । वैसे ये स्वाभाविक है । ऐसे अनूठे विधा में रचने पर ये समस्या तो कुछ हद तो उठेगी ही । परंतु यदि आप इसे केवल कहानी संग्रह मानकर पढ़ें तो उस समस्या का भी निवारण हो जाएगा ।
ये किताब मेरे पसंदीदा किताबों के list में तो शामिल हो गई । अब आप पढ़ें और बताएं ।
— vidyabhushan






