बहती गंगा : पुस्तक समीक्षा

शिवप्रसाद सिंह ‘ रुद्र ‘ की इस किताब के बारे में यही कहूंगा कि हिंदी साहित्य का ये दुर्भाग्य है कि ऐसी रचना को कोई विशेष स्थान नहीं मिला । यह कोई प्रसिद्धि नहीं प्राप्त कर सका जबकि पात्रता में यह किसी भी बहुचर्चित उपन्यास से कम नहीं ।

ये रचना उपन्यास है या कहानी संग्रह ? इस बात पर आज भी आलोचकों को संदेह है। हालांकि इसका उत्तर लेखक स्वयं ही एक प्रश्न से देता है , वो पूछता है कि ” क्या कथा साहित्य की विधाएं कहानी और उपन्यास तक ही सीमित है ? ” विधाएं साहित्य की जननी नहीं है , साहित्य ही विधाओं का जनक है ।

ये कृति एक अनूठा प्रयोग है । इसमें 17 अध्याय हैं । प्रत्येक अध्याय अपने आप में एक कहानी है और सब मिलाकर एक उपन्यास भी । कथाएं बनारस के इर्द-गिर्द घूमतीं हैं । लगभग 200-300 वर्ष के अवधि में इसके कथावस्तु का विस्तार है । अन्य उपन्यासों की तरह इसका कोई मुख्य पात्र नहीं है या यूं कहें कि इसका मुख्य पात्र किसी व्यक्ति के बदले कोई स्थान विशेष है । ये कहानी है गंगा के घाटों की , उनसे अठखेलियां करतीं लहरों की , बनारस के गली – मुहल्ले – चौक – चौराहे की । ये कहानी है बनारस के बरामदे में सरकते समय की । किस्सा है कोई , गल्प है साहेब । कुछेक तो दंतकथा ही समझिए ।

क्या नहीं है आख़िर! प्रेमी का विरह , प्रेमिका की वेदना ; पति – पत्नी का व्यंग्य , सौत का कटाक्ष ; शौर्य का बखान और ज़ुल्म की दास्तान । लेखक की भाषा पर पकड़ केवल प्राक्कथन पढ़कर ही समझ सकते हैं । कुछेक शब्दों को छोड़ दें तो बेहद आम शब्दों का प्रयोग किया गया है और जिस समझदारी से स्थानीय बोली का प्रयोग संवाद के दौरान किया गया है वह भी प्रशंसनीय है । कहावतों और मुहावरों का प्रयोग आकर्षित करता है जैसे ये उदाहरण देखिए — ‘ बड़ी सहुआइन के मुंह फुलाने की आशंका से उनके हाथ पैर फूल गए ।

कम शब्दों में चरित्र चित्रण कितने अच्छे से किया जा सकता है इसका भी उदाहरण यहां मिल जाएगा । जैसे एक कहानी में अमीरन पात्र का चित्रण देखिए — …. वहां एकत्र लोगों में निमूंछिए कहते , ” बेहया है ” , अधेड़ कहते , ” बेलौस है ” , बूढ़े कहते , ” जोगिन है ” और स्वयं अमीरन पूछने पर कहती ” मैं क्या थी ये भूले जमाना हो गया है । “

मेरे मन में ये प्रश्न हमेशा ही उठता रहा है कि क्यों हिंदी साहित्य में केवल विलाप और व्यथा को ही स्थान मिला ? हिंदी कथा साहित्य को तो जैसे पीड़ा के अलावा कुछ दिखता ही नहीं । आलोचक भी हर किताब के बारे में यही कहते मिलेंगे कि — ” इसमें फलाने समस्या का उल्लेख मिलता है । ” क्यों भई ! क्या समस्या से इतर कोई विषय नहीं ? आप उल्लास क्यों नहीं लिख सकते? व्यंग्य से क्या दुश्मनी भंते ? हे सुज्ञ ! फंतासी ने क्या अपराध किया है ?

कुछ नहीं ! …. आप बस समस्याओं पर विमर्श करेंगे । वास्तव में भारत और भारत का साहित्य दोनों ही विचार – विमर्श के तले ऐसा दबा है कि उसकी पीठ ही टेढ़ी हो गई है । इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने इस लीक को तोड़ा है । पीड़ा पुराण के इस रूढ़ि को ख़तम किया है । ऐसा भी नहीं है कि वास्तविकता से मुंह मोड़ लिया । वेदना , यंत्रणा , व्यंग्य , कटाक्ष , उल्लास आदि भाव उचित मात्रा में इन कथाओं में मिल जाएंगे ।

बस एक दिक्कत जो आपको हो सकती है वह ये कि कहानी कहीं कहीं कंफ्यूज करती है । वैसे ये स्वाभाविक है । ऐसे अनूठे विधा में रचने पर ये समस्या तो कुछ हद तो उठेगी ही । परंतु यदि आप इसे केवल कहानी संग्रह मानकर पढ़ें तो उस समस्या का भी निवारण हो जाएगा ।

ये किताब मेरे पसंदीदा किताबों के list में तो शामिल हो गई । अब आप पढ़ें और बताएं ।

— vidyabhushan

स्वामी : पुस्तक समीक्षा

उपन्यासकारों में शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय का स्थान सर्वोच्च है । कम से कम मेरे लिए तो अवश्य ही । उनके शब्दों के प्रति मेरा आकर्षण उतना ही सहज है जितना किसी फतींगे का प्रकाश के प्रति होता है । शरत बाबू से मेरा परिचय बचपने में हो गया था । छठी कक्षा में मैंने ‘ बिराज बहू ‘ पढ़ा , जिसके बारे में कभी विस्तार से चर्चा करूंगा । तब से लेकर अब तक कितनी ही किताबें पढ़ीं पर वैसा रस कहीं और न मिल सका ।
वैसे तो उनकी कहानियों के सभी पात्र उल्लेखनीय हैं , परन्तु उन कथाओं की नायिकाओं का चरित्र अविस्मरणीय है । ख़ासकर जब वो नायिका सौदामिनी जैसी हो ।

सौदामिनी उर्फ मिनी , शरत बाबू के लघु उपन्यास ‘ स्वामी ‘ की नायिका । तीक्ष्ण और चंचल ।

हां तो मैं , इसी उपन्यास की बात करने वाला हूं ….. स्वामी की । इसे दो बार लिखा गया । प्रथम बार शरत चन्द्र द्वारा और उसका पुनर्कथन हुआ मन्नू भंडारी की कलम से । अजीब बात तो ये है कि जो कहानी स्वयं शरत चंद द्वारा लिखी गई है वही उनकी नहीं लगती । मन्नू भंडारी ने शब्द लिखे नहीं हैं बल्कि पिरोए हैं तभी शरत साहित्य को शरत बाबू से बेहतर लिख दिया । ये बात अतिशयोक्ति लग सकती है पर मैंने तो ऐसा ही पाया । अब प्रशस्ति छोड़कर कथावस्तु पर आता हूं ।

ये कहानी है मिनी , नरेन और घनश्याम की ।ये कहानी है नारी के मन में चल रहे द्वंद्व की । एक द्वंद्व है जो लगातार मिनी के मन में चल रहा है । एक उलझन है जो सुलझता ही नहीं ।

” नरेन प्रेम कर सकता है, पर निभायेगा घनश्याम ही ।” मामा के इस एक पंक्ति ने मिनी को कभी चैन से रहने न दिया । मामा ने यूं ही तो नहीं कहा होगा । आखिर मिनी के सुख की चिंता मामा से अधिक कौन करता था? वो उधेड़बुन में है। पति और प्रेमी में आख़िर किसका चयन करे ? कभी प्रेमी से किया वादा जीत जाता है तो कभी अपराध बोध से वो भर जाती है ।

ये कथा महज़ एक मर्मस्पर्शी कथा से इतर सौदामिनी की यात्रा का वृत्तांत है । अनास्था से आस्था की यात्रा का वृत्तांत । आख़िर किसपे उसने अपनी आस्था गढ़ी? किसका हुआ उसकी श्रद्धा पर अधिकार ? कौन हुआ मिनी के मन का स्वामी ?


Vidyabhusan Yadav

स्वीकृति में सुख

बाज़ार बंद है और सड़कें ख़ाली । न तो मोटरगाड़ियों की आवाज़ें हैं , न ही भीड़ का शोर । एक सन्नाटा सा पसरा है दिशाओं में । इंसान अपने ही घरों में कैद हो गया है । बाहर बीमारी का डर है और अन्दर अकुलाहट एकांत से ।
सवाल ये है कि ये बेचैनी क्यूं है और इसका इलाज क्या होगा ?

महाकवि मिल्टन ने अपनी किताब ‘पैराडाइज लॉस्ट’  में कहा है – ‘ एकांत सर्वोत्तम समाज है ।’ आश्चर्य है ! कैसी उक्ति है ये ! एकांत….और समाज !! ….
इसको यूं समझिए कि एकांत सर्वोत्तम साथी है । लेकिन कैसे ….और अगर है तो इतनी बेचैनी क्यूं होती है ? अकेलापन काटने क्यों दौड़ता है ?

क्योंकि एकांत आत्मदर्शन का समय होता है । सच का सामना ! और मानव मन बड़ा होशियार है , वो सत्य तक पहुंचने नहीं देगा ।  वो बहलावा देगा , आज तक आपको ऐसे ही तो फुसला रखा है उसने । वो कार्य दिखाएगा , लक्ष्य दिखाएगा । वो सब काम जो गैरजरूरी है । आखिर जीने से ज्यादा जरूरी क्या हो सकता है ? लेकिन नहीं , प्रगति की लालसा में इंसान जीना ही भूल गया । मशीन बनाता बनाता खुद मशीन बन गया ।

Acceptance is the key

कभी निरर्थक बैठ जाइए । सभी कार्यों के बोझ से मुक्त । बस ख़ाली बैठिए और देखिए अपने आस पास । कभी बस इतना ही कीजिए कि भोजन के हर एक निवाले पर ध्यान दीजिए । चबाने की क्रिया पर ध्यान दीजिए । रोटी का असली स्वाद तब मिलेगा । कभी सांसों की गति को घूरिए । और सुबह से शाम तक का हर एक काम ध्यान से कीजिए , जैसे कोई अनुष्ठान हो , जैसे कोई व्रत । फिर न तो वक्त कम पड़ेगा न ही ज्यादा ।

कोई भी दुख अभाव से होता है । ये अकुलाहट भी स्वीकृति के अभाव से ही है । आप स्वीकार कीजिए अपनी स्थिति को , समय को , जीवन को । सारे समस्याओं का हल मिल जाएगा । ध्यान रहे मन को बाध्य न करें बल्कि सहज स्वीकृति आवश्यक है । स्वीकृति में सुख है ।

Vidyabhushan

मातृभाषा और हिंदी

हिंदी राष्ट्रभाषा हो सकती है परन्तु ये हमारी मातृभाषा नहीं है । जन्म से ही हम अपने आस-पास जिस भाषा को बहुधा सुनते और बोलते हैं , वही हमारी मातृभाषा होती है। मातृभाषा क्षेत्र विशेष की संस्कृति है , हमारी विरासत । भाव–भूमि–भाषा का जो संबंध है वह मातृभाषा के ही संदर्भ में कहा गया है। इस तरह बिहार में मैथिली , मगही , भोजपुरी , अंगिका आदि वहां की मातृभाषा हुई । पंजाब में पंजाबी , उड़ीसा में उड़िया और दक्षिण में तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, आदि । फिर सवाल उठता है कि हिंदी क्या है और कहां की भाषा है ? उत्तर सुन के आप चौंक सकते हैं । वास्तव में हिंदी भाषा ही नहीं है । भाषा होने के लिए तीन चीजें अनिवार्य है — लिपि , शब्द और व्याकरण । हिंदी की लिपि देवनागरी है जो संस्कृत से उधार ली गई है । इसके ज्यादातर शब्द भी संस्कृत से लिए गए हैं । कुछ को जैसे का तैसे और कुछ के रूप बदलकर । कितने ही शब्द क्षेत्रीय भाषाओं से मोल लिए गए हैं । हिंदी का व्याकरण भी तो संस्कृत व्याकरण का अपभ्रंश ही है या पूर्णतया संस्कृत व्याकरण ही कह लीजिए । अब ये बात विचारणीय है कि जिस भाषा की न लिपि हो , न शब्द और न व्याकरण । वो भाषा की श्रेणी में कैसे रखी जाए ? इसलिए ये सिद्ध होता है कि हिंदी भाषा नहीं है ।
फिर हिंदी है क्या? इसके दो उत्तर हैं — १. षडयंत्र २. भाषा परिवार । मातृभाषाओं के क्षय से क्षुब्ध लोग हिंदी को षडयंत्र कहते हैं , जो कुछ सीमा तक सही भी है । वहीं कुछ विद्वान इसे भाषा परिवार कहते हैं ।

भाषा के संकल्पना में तीन श्रेणियां होती हैं — १. बोली २. भाषा ३. भाषा परिवार । बोली किसी भी भाषा के बोलने के ढंग मात्र पर निर्भर करती है । शब्द, व्याकरण और लिपि समान ही होते हैं केवल उच्चारण का अंतर होता है । जैसे पंजाबी , हरयाणवी , मैथिली आदि सभी भाषाओं की कई बोलियां हैं । फिर भाषा की श्रेणी आती है । इसमें शब्द , लिपि और व्याकरण तीनों अथवा कोई दो अलग होते हैं । इसका विस्तार कुछ बड़े भूभाग पे होता है । फिर भाषा परिवार – इसमें कई भाषाओं के शब्द मिले होते हैं । किसी एक मूल भाषा की लिपि और व्याकरण का आधार प्राप्त होता है इसे । वैसे ऐसी भाषाओं के लिए भाषा परिवार शब्द का प्रयोग भी १००% ठीक नहीं है । क्योंकि भाषा परिवार का निर्माण उत्पत्ति के आधार पर कई समान भाषाओं के मेल से होता है , उदाहरण — हिन्द–यूरोपीय , चीनी–तिब्बती , सामी–हामी इत्यादि । भाषा परिवार की संकल्पना व्यवहार के लिए नहीं है । ये केवल अनुसंधान व शैक्षणिक कार्यों की सैद्धांतिक सामग्री भर है । जबकि हिंदी तो लिखने , बोलने और पढ़ने में प्रयोग की जाती है । ऐसे में हिंदी को षडयंत्र कहना उचित जान पड़ता है । परंतु ऐसा नहीं है , डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार हिंदी संपर्क भाषा है । भाषाओं के बीच की कड़ी । एक विशेष कार्य का निमित्त । ग्लोबाइजेशन के लिए हिंदी जैसे मिश्रित भाषा की ही जरूरत है , जिसे लगभग हर क्षेत्र , हर वर्ग के लोग व्यवहार में ला सकें । ऐसी भाषाएं न हो तो कितना मुश्किल होगा जनजीवन ! आखिर कितनी भाषाएं सीखेंगे लोग !


भारत की आजादी के बाद भारतीय संघ की अखंडता के लिए भाषा की समस्या खड़ी हो गई थी । ऐसे में सर्वसम्मति से हिंदी को ये कार्यभार दिया गया ।

मातृभाषा स्वयं के व समाज के उत्कर्ष का माध्यम है ।


यद्यपि भारतीय संघ के संगठित रहने के लिए हिंदी अतिआवश्यक है परन्तु ये बात भी नकारी नहीं जा सकती कि इससे अन्य मातृभाषाओं पर क्या दुष्प्रभाव पड़ा है । लोग अपनी मातृभाषा हिंदी को ही मान बैठे हैं। इससे अन्य मातृभाषाओं का लोप हो रहा है । उनके प्रसार में बाधा पड़ गई । यहां तक कि लोग मातृभाषा बोलने में शर्म महसूस करने लगे । क्योंकि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा कम और पढ़े–लिखों की भाषा अधिक थी । ये सभ्य लोगों की भाषा थी । हालांकि कालांतर में अंग्रेजी ने यही काम हिंदी के साथ कर दिया । इन सब राजनैतिक पेंचों से भाषा और संस्कृति दोनों ही का क्षय हुआ । या यूं कहें कि भारत के गौरव का क्षय हुआ ।
हर एक भाषा सुंदर है और भाषाओं की सीखना एक हितकर गुण। परंतु मातृभाषा स्वयं के व समाज के उत्कर्ष का माध्यम है । उन्नति का मार्ग । मातृभाषा का अधिकाधिक प्रयोग करें और उसपर गर्व करें ।

भाषा की सीमा

अंग्रेज़ी अथवा किसी अन्य पश्चिमी भाषा में ‘ बारात ‘ के लिए कोई उपयुक्त शब्द नहीं है । कुछेक शब्द प्रयोग किये जाते हैं पर वे उतने सटीक नहीं जान पड़ते । ऐसे ही ‘ जूठा ‘ के लिए कोई अंग्रेज़ी शब्द ढूंढ़ पाना मुश्किल है । वैसे तो ‘ जुगाड़ ‘ का भी कोई पर्याय दुर्लभ है । और ऐसे सैंकड़ों शब्द हैं जिनके समानार्थक नहीं मिल सकते ।

अगर ये शब्द अंग्रेजी में नहीं हैं तो अंग्रेजी के भी सैकड़ों शब्दों का हिंदी जुड़वा मिलना मुश्किल है । ये परेशानी दुनिया की हर भाषा के साथ है । अनुवादकों को अक्सर इससे जूझना पड़ता है । अब काम ही इतना मुश्किल ले लिया उन्होंने ! अनुवादक केवल शब्दों की अदला – बदली थोड़ी करता है ! वो जोड़ता है दो शब्दों का संबंध , बड़े दुलार से रख देता है भावनाओं को उठाकर दूसरे पालने में , ज्यों वह पिता हो और शब्द उसकी दुहिता । अनुवादक करता है गठजोड़ दो संस्कृतियों का ।

अनुवादक करता है गठजोड़ दो संस्कृतियों का

ये बात तो सर्वविदित है कि भाषाओं का संबंध संस्कृतियों से वैसे ही है जैसे सोने और उससे बने कंगन का । आप सोच रहे होंगे ये कैसी उपमा दे बैठा मैं ? …. परन्तु यक़ीन मानिए बिल्कुल उचित कहा मैंने । जैसे सोने का कंगन सोने के बग़ैर नहीं हो सकता वैसे ही संस्कृति के बिना भाषा का स्वरूप नहीं ।
संस्कृति भाषा की मां नहीं है । संस्कृति स्वयं भाषा ही है । वह भाषा को जन्म भी देती है और उसमें अत्याज्य रूप से समाहित भी हो जाती है । कैसी विचित्र बात है न ! मानो ऋषि दुर्वासा का कोई शाप !

किसी भी भाषा में उसका भूगोल , वहां के धार्मिक रिवाज़ , वहां का पहनावा , वहां का इतिहास लगभग सब मिल जाएगा । जैसे बिहार में किसी संतप्त के जिह्वा से ये शब्द फूट पड़ते हैं — ” मन करता है माहुर खा के मर जाएं । “
अब अगर आप देखें तो इसमें वहां के क्षेत्रीय वनस्पति की जानकारी भी है । माहुर – कोई ज़हरीली वस्तु , संभवतः किसी पौधे या पेड़ का फल ।

ये भौगोलिक व सांस्कृतिक शब्दावली जहां भाषा के सौंदर्य को बढ़ाती है वहीं भाषा की सीमा भी तय करती है । इसी कारण से भाषाओं में परस्पर समानार्थक ढूंढ़ पाना श्रमसाध्य होता है या असंभव ।

हालांकि ग्लोबलाइजेशन और डिजिटलाइजेशन ने भाषाओं पर बड़ा उपकार किया है । विश्व के अतिदुर्गम क्षेत्रों की भाषाएं भी अब सुनने–बोलने में आतीं हैं । उनका प्रसार आसान हो गया है । परन्तु यही एक नई दुविधा भी है । भाषाएं अपना शुद्ध स्वरूप खो रही हैं । उनके शब्द विकृत हो रहे हैं । पर इसमें दुःख कैसा, चिंता कैसी !

यही तो होता रहा है । समय के चाक में संस्कृति का घड़ा बना और उस घड़े में भाषा रूपी जल ने अपनी आकृति पाई । न समय रुका है , न संस्कृति स्थिर है और न ही भाषा का कोई सुनिश्चित स्वरूप ।

Vidyabhusan Yadav

जो हारा वही सिकंदर

जायसी के पद्मावत महाकाव्य का सबसे यादगार किरदार है रानी पद्मावतीऔर राणा रतन सिंह । ठीक वैसे है जैसे होमर के ILIAD का हेलेन और पेरिस । इधर चितौड़ – उधर TROY ।

दोनों कहानियों में कितनी समानता है । दोनों ही में जिसे हार मिली वही अमर हो गया । उसकी कीर्ति – उसका यश युग-गान बन गया । कैसा आश्चर्य कि पराजित के पराक्रम को ‘ उपमान ‘ बनाया गया और विजित ही उपेक्षित रहा !

दुनियाभर से चुन चुन के पराजितों की कहानियाँ पढ़ें , वो किसी दिग्विजयी के गौरवगाथा से अधिक रोचक लगेगी क्योकि पराजय में संघर्ष अधिक होता है , संघर्ष जीवन का श्रृंगार है और श्रृंगार में आकर्षण होता है । या सीधे यूँ कह लें कि पराजय में ही आकर्षण है ।

वैसे क्या जीतना जरूरी था ILIAD में पेरिस का? ….नहीं… , मैं समझता हूं अगर वो जीत जाता तो ILIAD एक औसत कहानी से अधिक कुछ न होता । ये TROY के दीवारों का गिरना ही है जिसने उसे महान बना दिया। उस युद्ध मे ट्रॉय शहर का बच्चा बच्चा मारा गया , मगर वो शहर आज भी जिंदा है … किस्सों में सही ।…. किसके बदौलत ? उसी अंतिम परिणाम के ― हार के बदौलत ।

किसी भी अफ़साने को अमर बनाने का एक अचूक उपाय है ― नायक की हार ! कि जैसे पराजय पराजय न हो , वरदान हो अमरता का । मानों समुद्र मंथन के कलश से छलकता सोमरस !

Vidyabhusan Yadav

प्रेम का सत्य

नायिका कहती है ― ” there is no such thing as love , only the proofs of love ” . और नायक निरुत्तर हो जाता है । वो आवक रह जाता है । अचानक ऐसे सच सुनने की आशा उसे न थी ।
वैसे अभी कुछ देर पहले वो कर भी तो यही रहा था , प्रमाण ही तो दे रहा था ― ” I love you ” …. । सच माने तो हम सब प्रमाण ही तो देते हैं । स्वयं को यक़ीन दिलाते हैं कि प्रेम जैसी कोई चीज है जो मैं करता हूँ , प्रेम जैसी कोई व्यवस्था है जो कायम है हमारे बीच । और यही मिथ्या-विलाप उसके साथ भी करते हैं जिसे हमारे प्रेम में होने का भ्रम है । बदले में वही शब्द सुनने की लालसा दबी होती है दिल मे । हम सामने वाले से भी प्रमाण चाहते हैं । वही शब्द – वही लाइनें बार बार , लगभग हर रोज दोहराई जाती है । बार बार ख़ुद को प्रमाणों से बहलाते हैं ।

जो नहीं है उसे बने रहने के लिए प्रमाण चाहिए । उसके लिए प्रमाण देह है , उसकी पहचान । जो है , उसे क्या आवश्यकता ! उसका होना ही उसका प्रमाण है । जो है उसे बताने की जरूरत नहीं होती , उसे परिभाषा की जरूरत ही क्या !

कई बार जिसे हम प्रेम कहते हैं वो त्याग , मोह अथवा कामेच्छा होती है और यदि इन सबको मिलाकर भी देखें तो ये सब केवल प्रेम का प्रमाण बनकर रह जाएंगे ।

प्रेम और कुछ नहीं , सत्य के आवरण से ढंका झूठ है । हाँ मगर नितांत आवश्यक झूठ ।

गांधी कथा – १

महात्मा गांधी और श्रीमद्भगवदगीता

महात्मा गांधी का गीताप्रेम सर्वविदित था । अपने भाषणों , लेखों , पत्रों आदि में जब तब वे गीता की महिमा गाते रहते थे । हज़ारो दफ़ा उन्होंने कहा कि मैं गीता का भक्त हूँ । अपनी आत्मकथा ‘ सत्य के साथ मेरे प्रयोग ‘ में उन्होंने लिखा है ― ” जब मैं परेशानियों से घिरा होता हूँ , गीता जी की शरण में जाता हूँ और फिर मुझे कोई न कोई ऐसा श्लोक मिल ही जाता है जिससे मेरे शोक अथवा चिंता का निवारण हो जाता है । ” निस्संदेह वे गीता के अनन्य भक्त थे । अटल विश्वास और अविरल श्रद्धा रखते थे । परंतु उनके अहिंसा के सिद्धांत और गीता की पृष्ठभूमि देखकर कुछ विरोधाभास स्वाभाविक है । जहाँ गीता का उपदेश श्रीकृष्ण युद्धभूमि में दे रहे हैं , अर्जुन को युद्ध के लिए प्रेरित कर रहे हैं वहीं महात्मा गांधी का अहिंसा का सिद्धांत इससे विलोम जान पड़ता है । फिर ये कैसे संभव है कि ये वो पुस्तक हो जो उनके जीवन की दिशा तय करती हो ? जो उनके निर्णयों को प्रभावित करती हो ?

शास्त्रों के अध्ययन के बारे में गांधी जी ने स्वयं कहा है ― ” शास्त्रों के शब्द नहीं पकड़े जाते , उसकी ध्वनि को देखना चाहिए । ” गीता की ध्वनि अहिंसा और अनासक्ति है । गीता की ध्वनि कर्म है ।

अर्जुन गांडीव रख देता है । युद्ध करने से मना कर देता है । वो अहिंसक होने का स्वांग रच रहा है , अभिनय कर रहा है । उसने इससे पहले कई युद्ध किये । वो अभी भी युद्ध कर लेगा , बस सामने से रिश्तेदारों ,भाई-बंधुओं को हटा दो । वास्तव में वह मोह से ग्रसित है । उसकी आत्मा को आसक्ति ने बांध लिया है । श्रीकृष्ण सर्वज्ञाता हैं । वे तत्काल समझ जाते हैं । वे देख लेते हैं अर्जुन को अपनी आत्मा का हनन करते हुए । वास्तविक हिंसा तो अर्जुन कर ही रहा था । बाहर से केवल अहिंसक होने का दंभ भर रहा था । श्रीकृष्ण ने उसकी आत्मा को मोहपाश से मुक्त किया । अकर्मण्यता के नरक से उसे बचा लिया । अहिंसा अकर्मण्यता का नाम नहीं है ।

गीता में भौतिक युद्ध का दर्शन करना ठीक नहीं , वह तो द्वन्द्व है , वैचारिक द्वंद्व । आत्मा और मन का द्वन्द्व ।
स्थिरता और निष्क्रियता का द्वन्द्व । अहिंसा का सम्बंध स्थिरता से है निष्क्रियता से नहीं । अहिंसा पौरुषता का दर्शन है निष्क्रियता का नहीं । और यही उपदेश श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता में दे रहे हैं । अर्जुन नकारात्मक अहिंसा अर्थात कायरता का शिकार है जो भय अथवा मोह से जन्म लेती है जबकि सकारात्मक अहिंसा का जन्म आत्मबल से होता है ।

किताबें व्यक्ति के जीवन की दिशा तय करतीं हैं । किसी व्यक्ति का चरित्र निर्माण किताबों , आसपास के व्यक्तियों और घटनाओं से होता है । ये बात गांधी जी के जीवन से सिद्ध होती है । वे आजीवन कर्मयोगी बने रहे । सत्य और अहिंसा के उपासक तो थे ही । अफ्रीका में मिले बहुमुल्य उपहारों को छोड़कर उन्होंने अनासक्ति पर भी अमल किया ।

उन्हें आजीवन इस बात का अफसोस रहा कि वे गीता के 18हो अध्याय कंठस्थ नहीं कर पाए परंतु गीता के उपदेशों को आत्मसात कर , उनपर अमल कर के उन्होंने संसार के समक्ष एक और उदाहरण रख दिया ।हज़ारों किताबें पढ़ने से बेहतर है किसी एक किताब को आत्मसात कर लेना ।

गांधी जी के लिए सत्य और अहिंसा साध्य है , गीता साधन और स्वयं साधक ।

Vidyabhusan Yadav